Tuesday, January 26, 2016

Republic Day 2016

गण की बात 

     स्वतंत्रता और उच्श्रृंखलता के बीच एक अस्पष्ट सीमा रेखा होती है। इस सीमा रेखा के भीतर का आचरण व्यक्ति की स्वतंत्रता मानी जाती है और उसका उल्लंघन उच्श्रृंखलता मानी जाती है। सीमा रेखा के अंदर का व्यवहार व्यक्ति के मौलिक अधिकार होते है और सीमा रेखा से बाहर का व्यवहार अनुशासन हीनता या अपराध। स्वयं विकसित, दीर्धकालिक, नियम पालन से प्रतिबद्ध व्यक्तियों के समूह को समाज कहते है। इस तरह ऐसी स्वनिर्मित सीमा रेखा का पालन सबके लिये अनिवार्य है, चाहे वह व्यक्ति हो, परिवार हो, सरकार हो या स्वयं समाज ही क्यो न हो। यह सीमा रेखा अस्पष्ट है, अघोशित है किन्तु अपरिवर्तन शील है। अर्थात इस सीमा रेखा में परिस्थिति अनुसार अल्पकाल के लिये व्यावहारिक संशोधन तो हो सकते हैं किन्तु बदलाव नहीं। इसका अर्थ हुआ कि राज्य भी ऐसी सीमा रेखा में न कोई बदलाव कर सकता है न अतिक्रमण।

     व्यक्ति सीमा रेखा के बाहर जाने से स्वतः अपने को रोक लेता है तो उसे स्वशासन कहते हैं। किन्तु यदि ऐसा व्यक्ति स्वतः को नहीं रोक पाता और परिवार या समाज के भय से रुकता है उसे अनुशासन कहते हैं। जो व्यक्ति न स्वशासन को माने, न अनुशासन को माने, उस व्यक्ति को नियंत्रित करने के लिए जिस इकाई को दायित्व दिया जाता है उसे शासन कहते हैं। इस तरह व्यक्ति पर अनुशासन स्थापित करने का दायित्व परिवार और समाज का होता है और शासन का दायित्व सरकार का। स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की गारण्टी परिवार, समाज और अंत में सरकार के द्वारा दी गई है।


     परिवार का अर्थ हाता है सम्पूर्ण अधिकार समर्पित व्यक्ति समूह। परिवार समाज व्यवस्था की पहली मूर्त इकाई है। परिवार व्यवस्था व्यक्ति के सहजीवन की पहली पाठशाला है। यदि परिवार व्यवस्था ठीक नहीं हुई और उसमें व्यक्ति को स्वशासन की ट्रेनिंग नहीं दी गई तो ऐसा व्यक्ति आगे चलकर न अनुशासन को समझ पायेगा, न शासन को। इसका अर्थ हुआ कि परिवार व्यवस्था स्वतंत्रता और उच्श्रृंखलता के बीच संतुलन की ट्रेनिंग देने वाली पहली इकाई होती है।



     दुनिया में मुख्य रुप से चार विचारधाराएॅ वर्तमान में स्पष्ट हैं। इन चारों विचारधाराओं के द्वारा चार संस्कृतियाॅ स्पष्ट दिख रही हैं–
1. इस्लामिक संस्कृति
2. साम्यवादी संस्कृति
3. पश्चिम की संस्कृति
4. भारतीय संस्कृति
इस्लामिक संस्कृति में व्यक्ति को कोई प्रकृति प्रदत्त स्वतंत्रता नही होती अर्थात् इस्लामिक संस्कृति में स्वतंत्रता और उच्श्रृखलता के बीच की सीमा रेखा या तो धर्म बनाता है या समाज। इस तरह समाज या धर्म तानाशाह होता है। राज्य भी धर्म से ही संचालित होता है। साम्यवाद में न धर्म होता है, न समाज, न व्यक्ति और न ही परिवार। वहाँ शासन ही सर्वोच्च होता है और एक प्रकार से शासन तानाशाह होता है। पश्चिम की संस्कृति में स्वतंत्रता और उच्श्रृंखलता के बीच एक सीमा रेखा का अस्तित्व होता है। यह सीमा रेखा न शासन द्वारा बनाई जाती है और ना ही धर्म द्वारा। बल्कि समाज और व्यक्ति के बीच ऐसी रेखा स्वतः बन जाती है। 


     भारतीय संस्कृति में भी पश्चिम की तरह ही एक प्राकृतिक सीमा रेखा बनी हुई है।प श्चिम और भारत की संस्कृति की सीमा रेखाओं में सिर्फ यही अंतर है कि पश्चिम की सीमा रेखा व्यक्ति के पक्ष में कुछ अधिक झुकी हुई है और भारतीय सीमा रेखा समाज के पक्ष में कुछ अधिक झुकी हुई है। मेरे विचार से आदर्श स्थिति वह होगी जब पश्चिम और भारत की सीमा रेखाएॅ थोड़ा थोडा सरक कर बीच में एक जगह स्थिर हो जायें।प श्चिम और भारत को मिलकर इस संबंध में प्रयास करना चाहिए।


    पिछले हजार वर्ष से भारत अनेक आक्रमणकारी संस्कृतियों की प्रयोगशाला बना हुआ है। पहले भारत इस्लाम की प्रयोगशाला बना और बाद में वह पश्चिम की प्रयोगशाला में बदलने को मजबूर हो गया। स्वतंत्रता के बाद भारत में साम्यवाद का प्रभाव बढ़ा जो लगभग 40 वर्षों तक चलता रहा। इस काल खंड मे राज्य ने स्वयं को समाज घोशित कर दिया और उसने यह मान लिया कि वह स्वतंत्रता और उच्चश्रृंखलता के बीच की सीमा रेखा से उपर है तथा उसमे संशोधन परिवर्तन का अधिकार रखता है। 


    विश्व मे चार प्रकार की व्यवस्थाए है। 1 राज्य नियंत्रित 2 राज्य विहीन 3 राज्य रक्षित 4 राज्य मुक्त। भारत में राज्य को ऐसी दिशा मे बढना था जहां समाज राज्य मुक्त दिशा मे चलने को स्वतंत्र हो किन्तु भारत समाज को किधर ले जा रहा है, यह स्पष्ट ही नहीं। भारत की दिशा राज्य नियंत्रित, राज्य विहीन और राज्य रक्षित को मिलाकर चलती दिख रही है। किन्तु राज्य मुक्ति के प्रयास शून्य है। अब भारत इस्लाम, साम्यवाद और पश्चिम के साथ मिलकर एक बेमेल खिचड़ी संस्कृति के साथ तालमेल बिठाने का प्रयास कर रहा है। पश्चिम की संस्कृति और साम्यवादी संस्कृति दोनों ही इस बात पर एकमत हैं कि परिवार व्यवस्था एक अनावश्यक व्यवस्था है और उसे धीरे धीरे कमजोर होना चाहिए। तब तक जब तक वह समाप्त न हो जाये। इस्लाम परिवार व्यवस्था को मजबूती से मानता है। किन्तु इस्लाम का प्रभाव भारत में घटता जा रहा है और पश्चिम का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, इसलिए परिवार व्यवस्था लगातार कमजोर हो रही है। 

     पश्चिम मानता है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित करना राज्य का दायित्व है। दूसरी ओर साम्यवाद मानता है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई औचित्य न होने से राज्य का दायित्व उसे सुख सुविधा देने तक स्वैच्छिक है। दोनों ही भारतीय संस्कृति की परिवार व्यवस्था के अस्तित्व को अस्वीकार करते है। भारत इस नये खिचडी प्रयोग के परिणामों को भुगत रहा है अर्थात् इस अस्पष्ट प्रयोग के परिणामस्वरुप भारत में अव्यवस्था उत्पन्न हो गई है। पश्चिम के देशो में ऐसी बेमेल खिचड़ी नही बनी जो तीन विपरीत गुण धर्म के अनाजों को मिलाकर बनी हो। ऐसी खिचड़ी साम्यवादी देशो में भी नहीं बनी और मुस्लिम देशों में भी नहीं बनी। भारत एकमात्र ऐसा देश रहा जहाॅ इस तरह के कई विपरीत गुण धर्म वाले अनाज की खिचड़ी बनाकर उसे भारत पर थोप दिया गया। भारतीय संस्कृति इस बेमेल खिचड़ी में अपना अस्तित्व तलाश रही है और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। भारत में चरित्र गिर रहा है, अनुशासन हीनता बढ़ रही है, और लगातार जीवन के हर क्षेत्र में हिंसा के प्रति विश्वास बढ़ रहा है। प्रशासन ओवरलोडेड है, स्वतंत्रता और उच्श्रृंखलता के बीच की सीमा रेखा अस्पष्ट होती जा रही है तथा एक अन्धकारमय भविष्य दिख रहा है।


     अब भी भारत के भाग्यविधाता यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि इस सारी अव्यवस्था का कारण व्यक्ति और राज्य के बीच से परिवार और समाज व्यवस्था को निकालने का प्रयत्न है। मैं स्पष्ट हॅू कि जब तक बालक को परिवार से और बालिग को समाज से अनुशासन सीखने के अवसर नहीं मिलेंगे तब तक राज्य चाहे जितना भी प्रयत्न कर ले, समाधान तो होगा ही नहीं। बल्कि स्थिति और बिगड़ती जायेगी। मेरे विचार से परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था को पुनर्जीवित करना, परिभाषित करना तथा अधिकार सम्पन्न करना सभी समस्याओं के समाधान की शुरुआत हो सकती है।


     मैं तो यह भी मानता हॅू कि भारत की न्याय व्यवस्था में भी परिवार और समाज का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप होना चाहिए। वर्तमान न्यायव्यवस्था असफल है तथा अन्यायपूर्ण भी है। या तो अपराधी छूट ही जाते है अथवा वे असंतुलित दण्ड भोगने को मजबुर हो जाते है। आज व्यक्ति समझ ही नहीं पा रहा कि परिवार समाज और राज्य के बीच यदि कही मतभिन्नता हो तो उसे क्या करना चाहिए। आज यह बात बिल्कुल ही स्पष्ट नहीं है कि एक नवजात शिशु कितने प्रतिशत परिवार का है, कितने प्रतिशत समाज का है, और कितने प्रतिशत उस पर राष्ट्र का स्वामित्व है। अब तो धीरे धीरे ऐसा लगने लगा है कि राष्ट्र ने उस नवजात पर अपना सम्पूर्ण अधिकार स्थापित करना शुरु कर दिया है। क्या सुरक्षित और असुरक्षित के बीच अपराध के प्रयत्न समान दंडनीय माने जा सकते है? इसी तरह भारत का सामान्य व्यक्ति समझ ही नहीं पाता कि भारत में स्त्री और पुरुष के बीच दूरी घटने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया जा रहा है अथवा दूरी बढ़ने को। आधुनिक व्यवस्था दूरी घटाने का प्रयास करती है तो परम्परागत व्यवस्था दूरी बढ़ाने का। आश्चर्य है कि दूरी घटाने और बढ़ाने के दो विपरीत प्रयत्नों को एक साथ प्रोत्साहित किया जा रहा है। 

    सामान्य व्यक्ति समझ ही नहीं पाता कि सरकार चाहती क्या है? वह ठीक करता है फिर भी कहीं कानून के चक्कर में फंस कर न्यायालय के चक्कर लगाने लगता है। मैं तो इस बात का हॅू कि न्याय व्यवस्था में पश्चिम, साम्यवाद और मुस्लिम संस्कृतियों से अलग हटकर एक नये विचार पर सोचा जाना चाहिए। न्यायालय में विचारण अपराध पर विचार करते समय एक सरकार का प्रतिनिधि तो एक उस परिवार का प्रतिनिधि हो जिसके प्रति अन्याय हुआ है और एक उस गाॅव का प्रतिनिधित्व हो, जिस गाॅव का रहने वाला वह पीडि़त पक्षकार हो। अपराधी ने तीन के अनुशासन को तोड़ा है। तो उसे तीनों की तरफ से अलग अलग दण्ड की व्यवस्था होना चाहिए। मैं समझता हॅू कि यह विचार लीक से हटकर है किन्तु परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था और कानून व्यवस्था को संतुलित और न्याय संगत करने के लिए अन्य उपायों के साथ यह भी एक उपाय हो सकता है।


     परिवार की परिभाषा क्या हो, अधिकार क्या हो। इस मुद्दे पर अलग अलग विचार हो सकते है। किन्तु परिवार व्यवस्था को पुर्निजीवित होना ही चाहिए चाहे उसका तरीका कुछ भी क्यों न हो। वर्तमान व्यवस्था इससे ठीक उल्टी दिशा मे चल रही है और उसे उस दिशा मे ही आनंद प्राप्त हो रहा है। हमारा कर्तब्य है कि हम राज्य व्यवस्था को ठीक दिशा मे चलने के लिये तैयार करे या मजबूर करे ।


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