Trump sandwiching India ?
गुरुघंटाल ट्रम्प के सामने
विश्वगुरु ब्रांड मोदी कहाँ गुम ?
- -सिद्धार्थ शर्मा
ट्रम्प 2.0 को आये एक साल होने को आया। इस एक साल में अमेरिका दुनिया का दादा, चीन उसका चैलेंजर और रूस उसको धता बतानेवाला दिख रहा है। नरेंद्र मोदी के विश्वगुरु के डंके की लंका ट्रम्प ने ऑपरेशन सिन्दूर के सीजफायर का श्रेय लेकर लगा दी। उससे पहले और बाद में हिन्दुस्तानियों को बेड़ियों में भेजने से लेकर व्यापार वार्तालाप की विफलता और टैरिफ युद्ध, रूस से सस्ता तेल लेना बंद करने तक के सफर ने विश्वगुरु की छवि को तितर बितर कर दिया।
आक्रामक अमेरिका और विस्तारवादी रूस-चीन के बीच झूलते विश्व में भारत के सामने क्या विकल्प है, ये जानने से पहले बाक़ी दुनिया किधर झुकेगी ये जान लेना बेहतर रहेगा। रूस और चीन दोनों ही विस्तारवादी देश हैं तथा अमेरिका, यूरोप, आदि पाश्चात्य देश उपनिवेशवादी। चीन रूस बंजर गालवान या व्यर्थ के यूक्रेन युद्ध में पड़ते हैं जमीन कब्जा करने के लिए और अमेरिका और अन्य गोरे ईरान या वेनेजुएला पर आक्रमण करते हैं -जमीन हथियाने नहीं बल्कि संसाधन पर कंट्रोल के लिए।
ट्रम्प ने नवम्बर 2025 में अपने सार्वजनिक दस्तखत से लैस राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में कुछ मूल चीजों का स्पष्ट उल्लेख किया है। इस रणनीति को कियान्वित करने के लिए -ट्रम्प दस्तावेज के प्रासंगिक अंशों का हिंदी रूपांतरण निम्नोक्त है। .....
..... ट्रम्प के अनुसार ये संयुक्त राज्य अमेरिका के मुख्य और अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित हैं।
1. पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहेगा हैं कि सामरिक स्थानों तक उसकी पहुंच बनी रहे।
2. अमेरिका इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र को खुला और स्वतंत्र बनाए रखना चाहता है ताकि सभी अहम समुद्री रास्तों में नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखा जा सके।
3. अमेरिका यूरोप की स्वतंत्रता और सुरक्षा बनाकर रखने के लिए अपने सहयोगी देशों का समर्थन करने के साथ ही पश्चिमी संस्कृति की पहचान फिर से मज़बूत करना चाहता है।
4. अमेरिका रोकना चाहता है कि कोई विरोधी शक्ति मध्य पूर्व, उसके तेल और गैस संसाधनों, और जिन रास्तों से वे गुजरते हैं, उन पर नियंत्रण कर पाए।
5. अमेरिका ये सुनिश्चित करना चाहता है कि अमेरिकी तकनीक और अमेरिकी मानक—ख़ासकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जैव-प्रौद्योगिकी, और क्वांटम कंप्यूटिंग में— अमेरिका ही दुनिया की दिशा तय करे।
इन सबकी प्राप्ति के लिए अमेरिका किसी भी देश को इतना शक्तिशाली नहीं बनने दे सकता कि वो अमेरिकी हितों को खतरे में डाल सके। अमेरिका अपने सहयोगी देशों और साझेदारों के साथ मिलकर वैश्विक और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखेगा, ताकि किसी भी प्रभुत्वशाली दुश्मन शक्ति के उभरने को रोका जा सके।
चीन के विस्तारवाद को रोकने के लिए अमेरिका ताइवान पर काफी ध्यान देगा। इसका एक कारण ताइवान का सेमीकंडक्टर उत्पादन में प्रभुत्व है, लेकिन सबसे बड़ा कारण यह है कि चूँकि वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक-तिहाई हर साल दक्षिण चीन सागर से होकर गुजरता है, इसका अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। इसलिए ताइवान को लेकर किसी भी संघर्ष को रोकना—खासकर सैन्य बढ़त बनाए रखकर—अमेरिका की प्रमुख प्राथमिकता है।
रूस के बारे में यूक्रेन में लड़ाई को जल्द से जल्द बातचीत के ज़रिए रोकना अमेरिका का एक मूल हित है, ताकि यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को स्थिर किया जा सके, युद्ध के अनजाने में बढ़ने या फैलने से रोका जा सके, और रूस के साथ रणनीतिक स्थिरता दोबारा स्थापित की जा सके।
इन सबके बीच में अमेरिका भारत को कैसे आंक रहा है ? भारत के बारे में ट्रम्प के राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति दस्तावेज के अनुसार........अमेरिका को भारत के साथ व्यापारिक और अन्य संबंधों को लगातार बेहतर बनाते रहना चाहिए, ताकि नई दिल्ली को इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र की सुरक्षा में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इसमें ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ QUAD को जारी रखना है। Trump National Security Strategy, November 2025 दस्तावेज का लिंक :
उपरोक्त ट्रम्प की घोषित नीतियों से ये स्पष्ट हो रहा है की आनेवाले समय में अमेरिका रूस के साथ स्थायित्व, चीन की घेराबंदी, यूरोप के साथ मित्रता, मध्यपूर्व पर नियंत्रण, और G20 , G7 , संयुक्त राष्ट्र संघ, BRICS, जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों को अप्रासंगिक मानेगा।
ट्रम्प के अनुसार QUAD में भारत की भागीदारी उसके राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है -इसीलिए वो भारत के साथ प्रेम, साम, दाम, दंड, भेद -हर हथकंडे के जरिये बेहतर सम्बन्ध बना के ही दम लेगा। आज ही भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जिओ गोर ने पदग्रहण के समय यही कहा - की वो आनेवाले महीनों, वर्षों में -भारत की नवोन्मेषी, लचीली और आध्यात्मिक जनता से सीधा संवाद करेंगे। मतलब ट्रम्प के लिए सरकारें अप्रासंगिक हैं सिर्फ जनता प्रासंगिक।
तो लब्बोलुआब ये निकलता है की चीन के पास आज आर्थिक शक्ति प्लस रूस है, अमेरिका के पास सैन्य शक्ति प्लस यूरोप है और भारत के सामने इन दोनों में से किसी एक पलड़े में जाने की मजबूरी है -क्योंकि तीसरा कोई पलड़ा बचता ही नहीं -जब मोदी सरकार सैन्य या आर्थिक दोनों में से एक मामले में भी अव्वल नही है तो ।
ऐसे में निकट भविष्य में भारत की सरकार को ये तय करना ही पडेगा की वो रूस चीन के साथ तिकड़ी बनेगा या अमेरिका के साथ क्वाड की चौकड़ी । विकल्प जटिल हैं -पर वर्तंमान विश्व परिदृश्य में तटस्थ रहने की गुंजाइश ख़त्म है। क्योंकि विश्वगुरु का गुरुघंटाल मैदान में आ चुका है।
अमेरिका के भारत को जबरदस्ती अपने पाले में रखने के अभियान में व्हाइट हाउस को कल तक जय भाजपा तय भाजपा करनेवाले, भारत में 1996 में पहली भाजपा सरकार से भी पुरानी Overseas Friends Of BJP के प्रवासी अमेरिकी भारतीयों की भी खूब मदद मिलेगी क्योंकि -क्योंकि उनके लिए राष्ट्रहित या राष्ट्रवाद से ज्यादा अमेरिका में मिल रही की सुख सुविधाएं महत्वपूर्ण हैं।
ये वो वर्ग है जिसके माध्यम से भाजपा को सालाना चालीस करोड़ के आसपास का चन्दा आता है, और ऊपर से भारतीय GDP का 3 प्रतिशत डॉलर में भी सालाना ये भारत में अपने 50 लाख परिवारों को भेजते हैं।
तो, यदि मोदी सरकार ट्रम्प के दबाव में अमेरिका की पिट्ठू बनती है तो निकट भविष्य में नाराज चीन सीमा पर घुसपैठ बढ़ा सकता है क्योंकि आपने जब सात समंदर पार वाले से दोस्ती की, तो चालाक पड़ोसी ये देखना चाहेगा की समस्या आने पर दूर का दोस्त कितनी मदद करता है -या नहीं।
संक्षेप में, भाजपा इकोसिस्टम का विश्वगुरु का सपना तो चूर चूर हो ही गया, ऊपर से ट्रम्प या झी जिनपिंग दोनों में से एक का कोपभाजन भी बनने की नौबत आ गई है मोदी जी पर। चौबे जी चले छबे बनने, दुबे बनकर लौटे। अंग्रेजी में इसे सैंडविच होना कहते हैं और हिन्दुस्तान में सांप छुछुंदर की स्थिति -न उगलते बने, न निगलते।

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