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Independence Day 2014

 ---- from perpetually  in-dependence  to  INDEPENDENCE           What started as a mutiny against a foreign regime in 1857 in Meerut by a sepoy martyr named Mangal Pandey culminated in the Independence of India and Pakistan 90 years and thousands of sacrifices later on 14/15 th August 1947. Those thousands of freedom fighters lay down their lives for a people who would be free to write their own destiny, their own ‘bhagya vidhaataas’ not dependent on anyone. Come 16 th August 2011, and a diminutive frail old man poses a benign question to the prevalent regime asking it to release the power it holds over its people by ushering in transparency. Anna’s Anshan and the regime’s Machiavellian response to it galvanized the nation and common men like you and me woke up to the fact that true independence still eluded India. India after over six decades still hadn’t attained the ideal state of people’s participati...

Tulsidas Jayanti

संत गोस्वामी तुलसीदास की जन्म जयंती की हार्दिक शुभकामनाए गोस्वामी तुलसीदास [१४९७ - १६२३] एक महान कवि थे। अपने जीवनकाल में उन्होंने १२ ग्रन्थ लिखे। उन्हें संस्कृत विद्वान होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है। श्रीरामचरितमानस वाल्मीकि रामायण का प्रकारान्तर से ऐसा अवधी भाषान्तर है जिसमें कई कृतियों से महत्वपूर्ण सामग्री समाहित की गयी | रामचरितमानस को समस्त उत्तर भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके बाद विनय पत्रिका उनका एक अन्य महत्वपूर्ण काव्य है।  लगभग चार सौ वर्ष पूर्व तुलसीदास जी ने अपनी कृतियों की रचना की थी। आधुनिक प्रकाशन-सुविधाओं से रहित उस काल में भी तुलसीदास का काव्य जन-जन तक पहुँच चुका था। यह उनके कवि रूप में लोकप्रिय होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मानस जैसे वृहद् ग्रन्थ को कण्ठस्थ करके सामान्य पढ़े लिखे लोग भी अपनी शुचिता एवं ज्ञान के लिए प्रसिद्ध होने लगे थे। रामचरितमानस तुलसीदास जी का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रन्थ रहा है। उन्होंने अपनी रचनाओं के सम्बन्ध में कहीं कोई उल्लेख नहीं किया है, इसलिए प्रामाणिक र...

Euthanasia

Euthanasia :: Death the Dearest.       The Supreme Court has recently called for a nationwide debate on euthanasia. Having seen more deaths from close quarters than most, and having been witness to such existential dilemmas in the past, i too am throwing my hat in the debating ring.      More than a decade ago i was faced with the terrifying moral dilemma of taking such a decision on behalf of a loved one whose life had reached terminal stage. In spite of best available medic al care by doctors, my loved one was deeply unconscious & life sustained purely on artificial support. Earlier, with full faculties intact and in a healthy state, the loved one had made it unequivocally clear to me & friends that since body is but a tool for conciousness to manifest itself, (like electricity & transmission wires) life would be meaningless without a synergy between the two. My loved one wanted a covenant from us that God forbid such a situation ar...

Badayun to Bangalore.... why is India rapists' haven ?

---बढ़ते अपराध के  व्यूह से निजात कैसे ?      बदायूं से लेकर बेंगलोर तक पुनः बर्बरता का प्रदर्शन हुआ है । चाहे 6 वर्ष की शहरी अबोध कन्या हो या ग्रामीण महिला,  इन सब के साथ   क्रूरतापूर्ण दुष्कर्म  की घटनाएँ  भारत सहित विश्वभर में खबर बन रही है । इतनी की, बड़े बड़े राजनेता भी  कह रहे हैं  की समाज को आत्ममंथन की जरूरत है । ये लोग यह भी कह रहे हैं की सरकार ने अपराधों से और प्रभावी ढंग से निपटने के लिए कानून को मजबूत बनाने के कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया है । मीडिया में चल रही लगातार बहस के दौरान भी भारत के बुद्धिजीवी कुछ ऐसी ही बातें करते तथा कड़ी से कड़ी सजा के हिमायती दिख रहे हैं  ।       टीवी एंकरों, राजनेताओं  की मानें तो पूरा समाज दोषी है, और बुद्धिजीवियों की माने तो हर दोषी को फांसी होनी चाहिए । इन दोनों की राय लागू  हो जाय तो भारत से मनुष्य प्रजाति डायनोसार के सामान लुप्त हो जायेगी । आश्चर्य है की भारत के  जिम्मेदार लोग यह भी नहीं जानते...

आप जैसा कोई मेरी जिन्दगी में आए

     इ तिहास गवाह है कि कालखण्ड के कुछ पड़ाव ऐसे होते हैँ, जिसमें विचारों को क्रियारूप देना कालपुरुष की माँग बन  जाती है । ऐसे में क्रिया प्रारम्भ करने से पहले गम्भीर चिन्तन करना आवश्यक होता है, क्योंकि बिना सोचे समझे प्रारंभ की गई क्रिया अक्सर घातक होती है ।       सन 2011 में भारत के बुद्धिजीवियों के समक्ष कालपुरुष ने ऐसी ही चुनौती रखी । अनायास प्रारम्भ हुए जनलोकपाल आन्दोलन को भारत की जनता का आशातीत समर्थन मिल रहा था । लम्बे समय से चले आ रहे विचारकों के तर्क -की शासन व्यवस्था पर नागरिक समाज का दबाव स्वस्थ लोकतंत्र का प्रतीक है -मूर्त रूप लेने लग गए थे ।       प्रायः यह देखा गया है कि जब भी विचारकों के निष्कर्ष मूर्त्त रूप लेने लगतें हैं, तब बुद्धिजीवी वर्ग उसका विरोध प्रारम्भ करता है क्योँकि यदि सही निष्कर्ष मूर्त रूप ले लें, तो बुद्दिजीवियों की आजीविका ही खतरे में पड़  जाती है, बुद्धिजीवी तो हमेशा समस्या के विश्लेषण से ही आजीविका चलाते आये हैँ । यदि समस्य...

I FUEL SWARAJ

 ---- I FUEL SWARAJ                  Thousands of years ago, the phrase SWARAJ was first propounded by sage Atri in Rgveda when he said ॥ व्यचिष्ठे बहुपाय्ये यतेमही स्वराज्ये ॥ Vyachishthe = universal franchise where all people have a right to participation. Bahupayye = whereby, the majority secures the right of minority. Yatemahi = let us all strive for. Swarajye = the ultimate objective of self-rule. In short, this Rgvedic verse extols thus: “Let Us All Strive For Swaraj Wherein All People Are Participators In Decision Making With A Magnanimous Outlook of Securing The Minority.”      This idea has been nurtured over millennium in the Indian subcontinent from Quetta to Kamrup including long phases during which Self-rule (Swaraj) was practiced as a governance model during the Buddhist age period   http://www.lokrajandolan.org/ancientindia....

-------- क्रान्ति 2014 ?

​ --------   क्रान्ति 2014 ?         आज नव वर्ष है । अगले कुछ हफ़्तों में भारत आम चुनावों  के दौर से गुजरेगा । भारत का औसत व्यक्ति इन चुनावों में पहले के चुनावों से अधिक उत्सुक दिख रहा है । हर एक की उत्कट इच्छा है कि कुछ  नया हो । कई लोग इन चुनावों को क्रान्ति  के रूप में  परिभाषित कर रहे हैं । क्रान्ति होनी भी चाहिए । लम्बी जड़ता को क्रांतियां ही ध्वस्त कर सकती हैं । ऐसे में महत्वपूर्ण है कि क्रान्ति को समझा जाय ।       यह भ्रान्ति है कि क्रांतियाँ भौतिक होती हैं | क्रांतियाँ असल में मनुष्य के दिमाग में होती हैं, भले ही उसकी निष्पत्ति व्यापक रूप से भौतिक दृष्टिगोचर हो | जो क्रांतियों को गहराई से नहीं समझते  वे क्रान्ति के बाद की परिस्थिति देखकर उस क्रान्ति का आकलन करते हैं | अगर क्रान्ति के बाद का समाज पहले से बेहतर प्रतीत होता है तो क्रान्ति की शान में कसीदे पढ़े जाते हैं | इसके  विपरीत अगर क्रान्ति के बाद का समाज पहले से बदतर प्रतीत होता है तो क्रान्ति को टायं-टायं फिस्स मान लिया जाता है |  ...

AAP Sting Analysis

_____ताकि सनद रहे  वर्त्तमान काल में चरित्र की दो परिभाषाएं भारत में प्रचलित हैं । पहला कानून की दृष्टि वाला चरित्र, दूसरा सामाजिक दृष्टिकोण में चरित्र ।  कानूनी चरित्र पर मेरा दावा है कि भारत की 99.9% आबादी फेल जायेगी क्योंकि कानून की नजर में तो सार्वजनिक स्थल पर बीड़ी पीनेवाला राहगीर भी दोषी पाया जाएगा !! वहीँ सामाजिक नजरिये में बीड़ी पीने की  तुलना में किसी शक्तिसम्पन्न व्यक्ति द्वारा किसी दुर्घटना ग्रस्त अशक्त की सहायता नहीं करना दोष माना जाएगा, जिसे कानून दोष नहीं मानता ।  महाभारत कालीन समाज में द्रौपदी कि चीर-हरण के समय भीष्म आदि का चुप रहना मान्य था पर आज का समाज  तरुण तेजपाल प्रकरण में शोमा चौधुरी की चुप्पी को  गलत मान रहा है, भले ही कानूनी रूप से शोमा जी दोषी नहीं हैं । यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि क्योंकि आज तक चरित्र कि कोई सर्वमान्य परिभाषा इजाद नहीं हुई है, तो उसीके अंतर्गत मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा योगिराज कृष्ण के चरित्र पर भी सवाल खड़ा करना आसान हो गया है ।  ऐसे में उन सभी समूहों के लिए यह अत...

Meaning of being Ganesh

इतिहास गवाह  जब-जब नए विचार का निर्माण होता है, तब-तब  तो उन विचारों के वहन के लिए वाहन भी नए होते हैं । शिव ने बैल चुना, विष्णु ने गरुड़ ढूंढ लिया क्योंकि विचार नए थे, तो वाहन भी नया ।  फिर गणपति सोचने लगे की अब हम कौन सा वाहन पसंद करें? मेरा काम है विद्या और ज्ञान का प्रचार करना । तो जहां भी थोड़ा सा भी अवसर होगा, छोटा सा भी छेद  होगा वहां विद्या और ज्ञान का प्रवेश होना चाहिए । इसीलिए गणेश जी ने चूहे को चुन लिया ।  वेदों में वर्णन है "गणानां त्वा गणपतिं  हवामहे" , अर्थात गणसेवक की भूमिका । यानी आनेवाले  समय में नेता नहीं रहेंगें और केवल गण-सेवक यानी समूह-सेवक बनते जायेंगे । अब जो नया  विचार आयेगा वह हरएक मनुष्य के पास पहुंचेगा । सब मिलकर सोचेंगे और सब मिलकर आगे बढ़ेंगे । एक बड़ा आदमी, और वह सबको मार्गदर्शन दे, लोग उसके पीछे चलें, यह पुरानी बात "गणेशत्व" से मेल नहीं खाती । "यतेमही स्वराज्ये  " - ऋग्वेद में अत्रि ऋषि का मन्त्र है । जो राजनैतिक और संकुचित दायरे में सोचते है, वे स्ट्रेंग्थ (शक्ति) और ...

Durga Shakti Nagpal Imbroglio

http://www.aapkarnataka.org/janasuddi/Janasuddi-1.pdf T he term Democracy originates from the  Greek  word  dēmokratía.   It means "rule of the people" and not "rule by representatives" as generally perceived. The definition implies that democracy is a system far above individuals; in fact it is collective in nature. And the key word for any collective exercise is participation. In ancient India, during Buddha’s time, such village republics existed aplenty where periodic local meetings took place in which ALL people of a locality took policy decisions. Thereafter, India went through nearly a millennium of slavery by various foreign civilizations until it gained independence in 1947. In this interim period, world over and especially in Europe and America, renaissance happened resulting in liberal thoughts taking center stage. The impact of it was that in such places democracies took root and flourished. These democracies were more or l...