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Ayodhya Judgement Ideal

लोकप्रिय राममंदिर से लोकहितकारी रामराज्य तक का सफर........



     भारतीय संस्कृति को समझना हो तो प्रकृति, विकृति तथा संस्कृति -इन तीनों शब्दों का अर्थ समझना होगा। भूख लगने पर खाना प्रकृति है।  पेट भरा होने के बावजूद स्वादिष्ट मिठाई खा लेना विकृति बन जाती है।  भूख हो, खाना भी हो, परन्तु एकादशी, रमजान, या उपवास के संकल्प के चलते नहीं खाना ही संस्कृति होती है।  तात्पर्य यह की संयम, विवेक और नैतिकता की भित्ति पर खड़े सद्विचार ही संस्कृति होते हैं।  

     भारतीय संस्कृति तीन कालखंडों से गुजरते हुए आज चौथे कालखंड में है।  पहला कालखंड ३ से ५ हजार वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुआ वैदिक काल रहा जो मूलतः प्रवृत्तिवाद तथा प्रकृति पूजा प्रमुख रही, जिसमें बाद में यज्ञहिंसा के अपभ्रंश के सुधार के रूप में, बुद्ध, महावीर तथा उपनिषद आये। दूसरा काल उपनिषदों का निवृत्तिवादी काल रहा जिसमें मानव की गूढ़तम जिज्ञासा के दार्शनिक प्रश्नोत्तर प्राप्त होते हैं । ऐसे जटिल दर्शनशास्त्र को सामान्य जनता तक लोकलुभावन भाषा में पहुंचाने हेतु तीसरा काल आया जिसे पौराणिक काल कहा जाता है।  वैदिक काल प्रकृति-प्रवृत्ति वादी काल रहा, उपनिषदकाल समष्टि-निवृत्ति वादी काल रहा तथा पौराणिक काल  कथा-कहानियों के माध्यम से, आदर्श मूर्त रूपकों के द्वारा लोकमानस को उचित-अनुचित को समझाने का काल रहा। पिछले १०० वर्षों में भारतीय संस्कृति बाक़ी दुनिया के साथ-साथ अपने चौथे काल में आ गयी है जो वैज्ञानिक काल है।  

     धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते हैं । विज्ञान का आधार होता है तर्क और अनुसंधान जबकि धर्म का आधार होता है श्रद्धा और विश्वास। विज्ञान निष्कर्ष  निकालता है और धर्म समाज तक पहुंचाता  है। विज्ञान बुद्धिप्रधान कार्य है और धर्म भावनाप्रधान आचरण।  विज्ञान लंगडा है और धर्म अंधा। इसीलिये दोनों को एक दूसरे का पूरक तथा सहयोगी माना जाता है। दुर्भाग्य से, २१ वीं शताब्दी में दुनिया में धर्म और विज्ञान के बीच दूरी बढने लगी है । विज्ञान आवश्यकता से अधिक भौतिकवाद की दिशा मे जाता दिख रहा है और धर्म आवश्यकता से अधिक रूढिवादी अंधविश्वास की राह पर। धार्मिक संगठन तर्क को अनावश्यक सिद्ध करने मे जी-जान से जुटे है और वैज्ञानिक धार्मिक आस्थाओं पर चोट करने मे शक्ति लगा रहे है ।  कुछ असत्य धारणाएं यदि घातक नहीं हैं तो उसके पीछे पडने की जरूरत ही क्या है। किन्तु विज्ञान का नाम लेकर ऐसी अनावश्यक असत्य धारणाओं को असत्य प्रमाणित करने मे बहुत अधिक शक्ति लगाई जा रही है। दूसरी और धर्म भी कालबाह्य अवैज्ञानिक मामलों को पकडे रखने की अनावश्यक कवायद कर के संघर्ष को बढ़ने का अवसर दे रहा है।  

     धर्म तथा विज्ञान दोनों ही को आचार्य विनोबा भावे का विचार ग्रहण करना चाहिए -"विज्ञान+राजनीति=सर्वनाश :: विज्ञान+अध्यात्म=सर्वोदय"।  धर्म और विज्ञान के बीच बढती दूरी सम्पूर्ण समाज मे भ्रम पैदा कर रही है । ऐसा भ्रम बहुत नुकसान कर रहा है । प्रकृति के अनसुलझे रहस्यों को असत्य सिद्ध करना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं । किन्तु विज्ञान ऐसा कर रहा है। दूसरी ओर आस्था पर टिकी जो अवैज्ञानिक धारणाएं असत्य या अनावश्यक प्रमाणित हो चुकी हैं उन्हें जबरदस्ती भावनात्मक प्रचार द्वारा सत्य सिद्ध करना भी घातक ही है। धर्म लगातार ऐसा कर रहा है।

     वर्तमान भारत ऐसे ही संधिकाल में खड़ा है जब शीघ्र ही भारत के सर्वोच्च न्यायालय की ५ सदस्यीय खंडपीठ अयोध्या मामले पर निर्णय देगी।  इससे पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने  २०१० में रामजन्मभूमि भूमि/बाबरी मस्जिद के स्वामित्व के मामले में विवादित भूमि के त्रिकोणीय स्वामित्व का निर्णय दिया था, जिसमें एक भाग सुन्नी वक्फ बोर्ड को, एक भाग निर्मोही अखाड़े को तथा एक भाग पर रामलला को स्वामित्व दिया गया था। भूमि स्वामित्व का मामला सबसे पहले अंग्रेजी हुकूमत के समय १८८५ में न्यायालय में दायर हुआ तथा दूसरी बार आजाद भारत में १९५० में। २०१० का त्रिकोणीय निर्णय १९५० में दायर विवाद को लेकर था जिसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी है जिसका निर्णय शीघ्र ही अपेक्षित है।

     क़ानून न्यायपूर्ण होने चाहिए अन्यायपूर्ण नहीं तथा न्याय कानून के दायरे में होने चाहिए कानून विरुद्ध नहीं। भारत में न्यायपूर्ण कानून बनाना विधायिका का काम है तथा कानून को न्यायोचित ढंग से परिभाषित करना न्यायपालिका का।  लॉ एकॉर्डिंग टु जस्टिस बाई लेजिस्लेचर और जस्टिस एकॉर्डिंग टु लॉ बाई ज्यूडीशियरी। भारतीय न्यायपालिका के सामने आज यह अवसर है की आस्था बनाम दस्तावेज के बीच एक को चुनकर ध्रुवीकरण का रास्ता खोले या क़ानून की एक ऎसी न्यायपूर्ण अभिनव परिभाषा दे जिसमें विज्ञान एवं धर्म के बीच समन्वय का मार्ग प्रशस्त हो।   क्योंकि प्रस्तुत अयोध्या मामले में एक पक्ष जहां भगवान् राम पर आस्था को मुख्य तर्क बनाये हुए है, वहीँ दूसरा पक्ष ऐतिहासिक प्रमाण को अपना प्रमुख तर्क।  


     रामचंद्र जी को कई लोग भगवान् मानते हैं, पर यह आवश्यक नहीं माना जा सकता की सब उन्हें भगवान् मानें | ईश्वर ने राम बनके अवतार लिया हो या राम नामक मनुष्य अपने चरित्र से ईश्वरीय बन गया हो, दोनों संभव है | वेदों में राम का जिक्र नहीं है, उपनिषदों में से एक स्वयं रामचंद्र जी के संवाद से प्रेरित है, तथा पुराणों में रामजी पर कई कथाएं हैं।  राम दशरथ नंदन थे या दशावतार में एक, यह धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भी भिन्न भिन्न है | राम पौराणिक पुरुष रहें हो, चाहे ऐतिहासिक पुरुष रहे होंपर निश्चित रूप से वे मर्यादा पुरुषोत्तम थे | रामायण के ३०० से अधिक संस्करण भारत के विभिन्न भाषाओं से लेकर समूचे दक्षिण एशिया तथा जापान तक में प्रचलित है। 

     आखिर क्या कारण है की  हजारों वर्षों से राम करोड़ों लोगों के दिल में रमे हैं ? हर धर्म के इतिहास में कई महापुरुषों का वर्णन मिलता है . अधिकाँश महापुरुष बुराई के खिलाफ विपरीत परिस्थिति में भी जद्दोजहद कर अंततोगत्वा विजय हासिल करते हुए दर्शाये गए हैं। भगवान् राम का चरित्र एक ऐसा अविरल चरित्र है, जिसमें बुराई पर जीत के बाद के आगे की भी कथा है जिसमें उन्होंने एक नूतन व्यवस्था का आगाज किया जो उनके देवलोकगमन बाद भी सुचारू चलती हुई दिखाई देती है। सामान्य भाषा में से रामराज्य कहा जाता है।

     राम के चरित्र की कुछ विशेषताएं स्वयंस्पष्ट है।  जैसे राम, परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले युग्मों के बीच तारतम्य बिठाने का उत्तम उदाहरण हैं | स्थूल दृष्टि से देखें तो रामसेतु का निर्माण इसका एक प्रतीक है | नदी पर तो अनेक पुल बने पर सागर के किनारों को पाटना राम ने ही किया |सूक्ष्म दृष्टि से भी देखें तो दशरथ-विदेह, वशिष्ट-विश्वामित्र, लक्ष्मण-परशुराम, लक्ष्मण-भरत, बाली-सुग्रीव, विभीषण-रावण -इन सभी पात्रों की सोच, व्यवहार, चालचलन एक दूसरे के विरोधी होते हुए भी राम द्वारा इनमें सफलतापूर्वक सामंजस्य बिठाने का प्रयास दर्शाया गया है | अतः परस्पर हितों का टकराव होते हुए भी, उनमें तारतम्य बिठाना राम के चरित्र की विशेषता है।  आज २१वीं सदी में भी मानव विकास के इस मुकाम पर लोकतंत्र की यही भावना है की सभी परस्पर विरोधी युग्म कैसे सहजीवन जी सकते है।  भारत समेत अनेक लोकतांत्रिक देशों के संविधान भी इसी अनेकता में एकता को यथार्थ में बदलने का प्रयास ही तो हैं।  

     दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं बौद्धिक, बुद्धिजीवी और बुद्धिनिष्ठ। बौद्धिक लोगों को केवल अपनी बुद्धि पर ही विश्वास होता है, बुद्धीजीवी, बुद्धि का लाभ के लिए उपयोग करता है, तथा बुद्धिनिष्ट को विशुद्ध बुद्धि पर निष्ठा होती है, वह बुद्धि चाहे अपनी हो या पराई | राम बुद्धिनिष्ठ थे इसका उदाहरण है की राम ने धनुष भंग विश्वामित्र जी के कहने पर किया, भरत मिलन में भरत की बात ही रखी, सुग्रीव से मित्रता हनुमान के सलाह पर की, सीता की खोज सुग्रीव के सुविधानुसार की, सागर का गर्वभंग लक्ष्मण की राय से, सेतु निर्माण समुद्र की सलाह पर, और रावण नाभि वध विभीषण के कहने पर किया।  आज २१वीं सदी के सभ्य सामाजिक व्यवस्था में भी तो ऎसी ही बुद्धि पर निष्ठा को आदर्श माना गया है, जहां जिसकी लाठी उसकी भैंस के स्थान पर उचित या अनुचित का विचार  बहुमत-अल्पमत के द्वारा नहीं लॉजिक से, राय मशविरे से किये जाने की व्यवस्था बनाई गई है।   

     राम का लोकप्रिय बनने का सबसे बड़ा कारण रहा उनके द्वारा रामराज्य की स्थापना रही ।  एक ऐसा राज्य जहां न कोई रोगी होता था, न कोई अनपढ़, न कोई गरीब होता, न शोषित। रामायण में रामराज्य का वर्णन करते हुए कहा गया  की -
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा ||
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ||
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।|
राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं, 
 काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं।।
पर्यदेवन्विधवानचव्यालकृतंभयम् |
नव्याधिजंभयन्वापिरामेराज्यंप्रशासति ||
सर्वंमुदितमेवासीत्सर्वोधर्मपरोअभवत् |
राममेवानुपश्यन्तोनाभ्यहिन्सन्परस्परम् ||
सर्वेलक्षणसम्पन्नाःसर्वेधर्मपरायणाः || 
भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥

     जिस आदर्श को कवि राम राज्य कहता है, उसमें तो असल में भरत राज्य, अर्थात नंदीग्राम का खडाऊं राज्य, अर्थात लोकस्वराज्य की चर्चा है, जिसमें सत्ता व्यक्ति या विशिष्ट व्यक्तियों के हाथ में न होकर सामान्य नागरिकों के हाथ में होती है।  राम की अनुपस्थिति के बावजूद १४ वर्षों तक अयोध्या में एक भी अप्रिय घटना नहीं घटी, राजा दशरथ की  मृत्यु के बावजूद, क्योंकि भरत ने स्वयं को केवल सुरक्षा एवं न्याय तक सीमित रखा, प्रशासन के चक्कर में नहीं पड़े। आजकल जब सरकारें रावण की दो प्रिय नेवर एंडिंग परियोजनाएं, जैसे  -सागर के पानी को मीठा बनाना और स्वर्ग तक सीढी बनाने जैसे उपक्रमों को ही साध्य मान बैठी हो, वैसे में यदि किसी राम ने लीक से हटकर जनता को मूलभूत सुरक्षा, न्याय, सुविधा तथा स्वतंत्रता देनेवाली नूतन व्यवस्था की नींव डाली तो रामराज्य की स्थापना करनेवाले उस राम को यदि सैकड़ों पीढ़ियों से करोड़ों लोगों ने आदर्श भगवत स्वरूप माना है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

     ऐसे समुद्रवत गंभीर और हिमालय जैसे स्थिर राम को जनप्रतिनिधि राष्ट्रपुरुष मानते हुए ही शायद हमारे संविधान शिल्पियों ने संविधान सभा द्वारा अंगीकृत भारत के मूल संविधान की प्रतियों में राम के चित्र को स्थान दिया। 

    आदर्श स्थिति यह होगी की भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका ऐसे संविधान सम्मत राम की विस्तृत व्याख्या करे और उनकी स्मृति में अयोध्या रामजन्मस्थान पर एक भव्य स्मारक की अनुमति दे जहां धार्मिक अनुष्ठानों के स्थान पर विश्वभर के ३०० से अधिक रामायणों में उल्लिखित उस प्रगतिशील विकेन्द्रित संघीय मॉडल के रामराज्य पर शोध होगा जो अभिनव मानव सभ्यता का इष्ट भी है, वर्तमान विश्व की मार्गदर्शक भी, और इसके नतीजतन भारत को विश्वगुरु की हैसियत दिलवानेवाला भी। रही बात साकार तथा निराकार की उपासना हेतु मंदिर-मस्जिद की, तो वे आसपास में हैं भी, नए बनाये भी जा सकते हैं । बाकी अंततोगत्वा, आनेवाले अदालत के फैसले को आदर देना हर भारतीय का लोकतांत्रिक फर्ज तो है ही।

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