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Showing posts from December, 2015

नाटककारों का साहित्य

           विचार और साहित्य एक दूसरे के पूरक होते हैं । विचार आत्मा है और साहित्य शरीर। विचार अपंग होता है तो साहित्य अन्धा । विचार बीज है तो साहित्य हवा, पानी, खाद, दवा और अंत में वृक्ष। यदि साहित्य और विचार को एक दूसरे का सहारा न मिले तो अलग अलग रहकर दोनो अपना महत्व खो देते है ।      दोनो के गुण भी बिल्कुल अलग अलग होते है और प्रभाव भी। विचार मख्खन रूपी तत्व होता है तो साहित्य मट्ठा । विचार कठिनाई से ग्रहण हो पाता है तो साहित्य आसानी से । विचार मष्तिष्क को प्रभावित करता है तो साहित्य ह्दय को। विचार तर्क प्रधान होता है तो साहित्य कला प्रधान। विचारों का प्रभाव बहुत देर से शुरू होता है और देर तक रहता है तो साहित्य का प्रभाव तत्काल होता है और अल्पकालिक होता है ।      साहित्य विचारों की कब्र होता है। अगर साहित्य विचारो को कब्र मे पहुंचाकर लम्बे समय तक के लिये सुरक्षित रखता है तो दूसरी ओर साहित्य विचारों को देश काल परिस्थिति के आधार पर होने वाले नये नये संशोधनो से भी दूर कर देता है। विचार व्यक्ति के ज्ञान का विस्...