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Quota for the Anti Quota


आरक्षण विरोधियों को आरक्षण का एक्स रे

     खबर है की मोदी कैबिनेट ने सोमवार को वर्तमान आरक्षित श्रेणी के बाहर की श्रेणी को आर्थिक आधार पर सरकारी नौकरियों एवं शिक्षा संस्थानों में 10% आरक्षण देने  की योजना बनायी है | 

     इस पहल से चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। कोई इसे सवर्ण आरक्षण कह रहा है तो कोई इसे असंवैधानिक कह रहा है | विपक्षी राजनितिक दल  इसे पॉलिटिकल स्टंट बता रहे हैं, तो सत्ता पक्ष इसे मास्टरस्ट्रोक बता रहा है | आने वाले समय में भाजपा इसे दोनों समूहों को फ़ायदा होता हुआ जताने की कोशिश करेगी | सवर्णों  को कहेगी की नया आरक्षण क्योंकि जातिगत आधार से बाहर होगा, अतः सवर्णों को  इसका सर्वाधिक लाभ मिलेगा, वहीँ वह अवर्णों को यह जतायेगी की चूंकि आर्थिक रूप से अवर्ण  सबसे कमजोर हैं, तो उनको अब दस प्रतिशत और अधिक आरक्षण मिलेगा | 

     भाजपा ने  सटीक आकलन किया है की शहरी जनसंख्या में जातीय विषमता से अधिक आर्थिक विषमता का रोष है, इसीलिए आर्थिक विषमता को दूर करने की घोषणा से उसे चुनावी लाभ होगा | काफी हद तक यह आकलन सही भी है क्योंकि गावों में जातीयता जितनी सघन है, शहरों में आर्थिकता उतनी ही सघन है | 

     सनद रहे की सवर्ण आरक्षण की राजनीति का इतिहास काफी पुराना है | पूर्ववर्ती सरकारों ने भी आर्थिक आधार पर सवर्णों को आरक्षण देने के कानून बनाये लेकिन सर्वोच्च न्यायपालिका की  ९ जजों की खंडपीठ ने इंदिरा साहनी केस में ही यह स्थापित कर दिया की भारतीय सविधान के अनुच्छेद १६ में सामाजिक पिछड़ेपन का अर्थ ही शैक्षणिक एवं आर्थिक पिछड़ापन होने के चलते अलग से आर्थिक पिछड़ेपन की श्रेणी बनाना असंवैधानिक है, अतः ऐसा प्रयास व्यर्थ है | 

    पूर्व में भी कोर्ट ने कई बार सवर्ण आरक्षण के प्रयास को निरस्त किया है | प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा आर्थिक आधार पर 10% का प्रस्ताव वर्ष 1992 में कोर्ट ने निरस्त कर दिया था। बिहार में 1978 में  कर्पूरी ठाकुर ने आर्थिक आधार पर सवर्णों को 3% आरक्षण दिया जिसे कोर्ट ने निरस्त कर दिया | 2015 में राजस्थान तथा हरियाणा सरकारों ने आर्थिक पिछड़ों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 14% आरक्षण  देने प्रस्ताव लाया जिसे 2016 में राजस्थान हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। गुजरात सरकार ने भी 2016 में सामान्य वर्ग के आर्थिक पिछड़े लोगों को 10% आरक्षण देने का फैसला लिया था। गुजरात  हाईकोर्ट ने इस फैसले को असंवैधानिक करार दे  दिया | 

इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण का लाभ केवल सामाजिक पिछड़ों को तथा उस की सीमा अधिकतम 50% से कम  मुक़र्रर कर दी है | साथ ही विभिन्न वर्गों के आरक्षण प्रतिशत हेतु वैज्ञानिक तकनीक से प्राप्त तथ्य ही मान्य किये हैं चाहे वह कालेलकर समिति रिपोर्ट हो या मंडल कमीशन रिपोर्ट | 

     ऐसे में बिना किसी तथ्यों के सहारे, नई  आरक्षण श्रेणी बनाने हेतु संविधान के अनुच्छेद १६ में संशोधन करके ही नई श्रेणी को आरक्षण कोटे शामिल किया जा सकता है | संविधान संशोधन संसद के दोनों सदनों २/३ बहुमत से ही पारित हो सकता है, जो संख्या भाजपा के पास नहीं है |  

अतः इस सरकार के कार्यकाल के अंत में ऐसी पहल का एक ही अर्थ निकलता है की भाजपा सवर्णों के बीच अपने खिसकते जनाधार को बचाने की कवायद कर रही है क्योंकि वह जान गयी है की २०१९ का चुनाव न वह  वह साम्प्रदायिकता की भट्टी की गर्म राख से जीत सकती है, न ही विकास की मृगमरीचिका में वोटर को पुनः भटका सकती है | वह जानती है की कहीं अगर सवर्ण एवं अवर्ण वोट एकमुश्त उसके खिलाफ पड़ गए तो, उसे अगली लोकसभा में भारी घटा हो सकता है | 

    संक्षेप में, आगामी लोकसभा चुनावों में प्रभावशाली सवर्ण वोट का संख्यात्मक अवर्ण वोट से मिलने की संभावना को ही समाप्त कर देने का प्रयास भर है १०% आर्थिक पिछड़ा आरक्षण गुब्बारा |

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