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Anna & Politics




-------------- अन्ना चले राजनीति की राह 



     अन्ना हजारे ने तीन अगस्त को जंतर मंतर से राजनीतिक पहल की घोषणा कर दी। इस घोषणा पर भले ही राजनीतिक दलों, समर्थकों, आलोचकों और शुभचिंतकों द्वारा मिश्रित प्रतिक्रिया दी जा रही हो लेकिन अन्ना हजारे और उनकी टीम की यह घोषणा राजनीतिक दल बनने की घोषणा भर नहीं है। यह जनता द्वारा सामाजिक आपातकाल की घोषणा है। ऐसा सामाजिक आपातकाल जिसमें जनता अब राजनीतिक शक्तियां अपने हाथ में लेने के लिए आगे बढ़ेगी। मै मानता हुं कि यह सामाजिक आपातकाल सफल हो सकता है और राजनीतिक दलों को सबक भी मिल सकता है बशर्ते टीम अन्ना कुछ सावधानियां बरतते हुए आगे कदम बढ़ाए।



     जब टीम अन्ना भ्रष्टाचार नियंत्रण को लक्ष्य मानकर लोकपाल की लडाई लड रही थी तब भी हम स्पष्ट कर रहे थे की भ्रष्टाचार भारत की प्रमुख समस्याओ का कारण नहीं है बल्कि वह तो सत्ता केन्द्रित शासन व्यवस्था का परिणाम मात्र है। संघर्ष कारणों के समाधान पर होना चाहिये, परिणामो के समाधान के लिये नहीं। टीम अन्ना इस संघर्ष देश को प्याज की परत परत निकालने जैसे दिखाना चाहती थी कि सरकार मे बैठे लोग जैसे दिखते है उससे भी कई गुना ज्यादा घाघ है। उन्होने अगस्त मे उठे लोकपाल तूफान को ठंडा होने दिया और अपने सभी वचनो से मुकर गई। उसे पता था कि अब वैसा तूफान उठ नही सकता और टीम अन्ना का खतरा सदा के लिये समाप्त है।



     सम्पूर्ण भारत मे सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन का अंतर आम तौर पर नही समझा जाता। इस अंतर को गांधी लोहिया जय प्रकाश आदि तो समझते थे जो अब जीवित नही है। अनेक राजनीतिज्ञ समझते हुए भी समझना हानिकर मानते हैं। रामदेव जी से तो ऐसी उम्मीद करना भी व्यर्थ है। हाल ही में विसर्जित टीम अन्ना के भी कुछ ही लोग यह अंतर आंशिक रूप से समझते है। यही कारण है कि टीम ने व्यवस्था परिवर्तन के लिये घोषित तीन मुद्दे ‘‘1. राइट टू रिकाल राइट टू रिजेक्ट 2. ग्राम सभाओ को विधायी अधिकार 3. लोकपाल‘‘ में से लोकपाल तीसरे क्रम मे रखा है। सच बात भी यही है कि लोकपाल ऐसा ही मुद्दा था।



     अरविन्द केजरीवाल हों या फिर जनरल वीके सिंह. जंतर मंतर पर जब जब इन लोगों ने कहा कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है, तब जनता ने जोश में उनके इस आह्वान को अपना समर्थन दिया | जंतर मंतर पर जो लोग आये थे वे बुलाये गये लोग नहीं थे. वे आये हुए लोग थे.|अपने से आये हुए लोगों की यह प्रतिक्रिया भविष्य के उस राजनीतिक परिवर्तन का खास संकेत कर रही है, जिसकी ओर हमारे राजनीतिक दल या बुद्धिजीवी जानबूझकर देखना नहीं चाहते | हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि “यदि कोई शासन व्यवस्था अपराध नियंत्रण मे अक्षम हो तो पहले उसे उचित मार्ग दर्शन देना चाहिये। यदि उससे कोई अच्छा परिणाम न निकले तो दूसरे कदम के रूप मे सत्ता परिवर्तन का मार्ग पकडना चाहिये। यदि सत्ता परिवर्तन के बाद भी स्थिति ठीक न हो तो समाज को चाहिये कि वह राजनैतिक आपात काल घोषित करके सम्पूर्ण शासन व्यवस्था अपने हाथ मे लेकर तब तक रखनी चाहिये जब तक नई राजनैतिक व्यवस्था न बने।” 

      भारत में तो पंद्रह वर्ष पूर्व ही आपातकाल की स्थितियां थी, भारत की जनता भी व्यवस्था परिवर्तन के हमेशा तैयार रही, किन्तु कोई स्पष्ट अवसर नही मिला। इस बीच सत्ता अदलती बदलती रही किन्तु कोई व्यवस्था परिवर्तन के लक्षण नही दिखे। अन्ना जी का लोकपाल आंदोलन भी कभी व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन नही था किन्तु निराश और भूखी जनता इसी आंदोलन के पीछे दौड पडीं। अब भारत की जनता को आभास हुआ है कि भारत की जनता व्यवस्था परिवर्तन चाहती है सत्ता परिवर्तन नहीं।



     व्यवस्था परिवर्तन क्या है, यह बात पूरी तरह तो भारत में सिर्फ लोक स्वराज्य मंच के तहत समझने की कोशिश की गई है। टीम अन्ना के अनेक साथी भी आंशिक रूप से व्यवस्था परिवर्तन को समझते हैं। व्यवस्था परिवर्तन का स्पष्ट लक्ष्य है सुराज्य प्रणाली को स्वराज्य प्रणाली मे बदलना। सुराज्य प्रणाली साठ पैसठ वर्षों से सक्रिय है जिसकी लाभ हानि हम देख चुके है। अब हम सुराज्य प्रणाली को बदलकर स्वराज्य प्रणाली लायेंगे जिसका चरम है अकेन्द्रीयकरण और प्रचलित शब्द है विकेन्द्रीकरण। भारतीय जनता पार्टी वामपंथी दल, समाजवादी दल तो घोषित रूप से केन्द्रीयकरण के पक्षधर है ओर कांग्रेस पार्टी व्यावहारिक धरातल पर केन्द्रीयकरण पर अमल करती रही है। सुराज्य व्यवस्था वर्तमान राजनेताओ के व्यक्तिगत व्यवसाय मे भी बहुत कमाई का माध्यम है। इस तरह वर्तमान समय मे सभी राजनैतिक दल सुराज्य के पक्षधर है। ऐसे समय मे टीम अन्ना ने स्वराज्य का नारा दिया है जो निश्चय ही व्यवस्था परिवर्तन की दिशा है।



     व्यवस्था परिवर्तन का सीधा सा अर्थ है, सत्ता का अधिकांश भाग केन्द्र सरकर के हाथो से निकलकर नीचे वाली इकाइयों के पास हो। नीचे की इकाइयो के विभाग भी ग्राम सभा के पास अधिक तथा उपर की इकाइयो के पास कम हों। संविधान संशोधन मे वर्तमान प्रणाली के साथ साथ किसी अन्य इकाई का भी अंकुश हो जिसके पास कानून बनाने तथा पालन करवाने का अधिकार न हो। निर्वाचित जन प्रतिनिधियों पर किसी अन्य स्वतंत्र इकाई का अंकुश हो। टीम अन्ना व्यवस्था परिवर्तन को आंशिक रूप से तो समझ रही है किन्तु बीच बीच मे किसानो की समस्या, मजदूरों की समस्या पर भी कुछ न कुछ बोल देते है जो इनकी नासमझी है। जब आप नीचे की ईकाइयों को अधिकार बांट देंगे तो आप यह क्यो कहेंगे कि हम किसानो के लिये अच्छी व्यवस्था देंगे। ऐसी बातों से तो आभास होता है कि टीम के कुछ लोगों के मन मे सुराज्य की प्रबल इच्छा है, अन्यथा आप नीचे की इकाइयों को अधिकार देने तक ही अपनी घोषणाओं को सीमित क्यो नही रखते? आप यदि कहें कि आप शराब बंद करेंगे तो प्रश्न उठता है कि शराबबंदी का निर्णय ग्रामसभा लेगी या सरकार? यदि सरकार लेगी तो आप सुराज्य और स्वराज्य का अंतर नही समझते।



     इसी तरह टीम के कई सदस्य भ्रमवश चरित्र की बार बार चर्चा करके भ्रम पैदा कर रहे हैं। चरित्र की भूमिका सुशासन मे होती है, स्वशासन में नहीं। कल्पना करिये कि एक महिला का अपहरण करके कोई ले जा रहा है। यदि कोई भ्रष्ट आतंकवादी या डकैत भी उस महिला को छुडाने तक सीमित हो तो वह महिला क्या करे? जब तक छुडाने वाला अपराधी उक्त महिला को अपने साथ ले जाने तक संदेहास्पद न हो तब तक उसके चरित्र से उक्त महिला को कोई दिक्कत नहीं होगी। चरित्रवान बूढों, खासकर गांधीवादियो मे यह खास बीमारी होती है कि वे हर मामले मे चरित्र घुसा देते है । सच बात तो यह है कि ये चरित्रवान लोग तानाशाह प्रवृत्ति के होते है। ये समाज को अपने समान चरित्रवान बनाना चाहते है। इन्हे यह मोटी मोटी बात समझनी चाहिये कि चरित्र का व्यवस्था पर विशेष प्रभाव नही पडता। व्यवस्था का चरित्र पर विशेष प्रभाव पडता है। आप बिगडी हुई व्यवस्था के साथ चरित्र की चर्चा जोडकर भूल कर रहे है। ऐसा लगता है जैसे उनके अलावा बाकी सब चरित्रहीन हो। किसी व्यवस्था को लागू करने मे चरित्र की आवश्यकता होती है न कि व्यवस्था परिवर्तन में।



     भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए अन्ना के अनशन को जिस तरह से जनता ने अपना समर्थन दिया वह इस बात का संकेत था कि जनता इस भ्रष्ट व्यवस्था से निजात पाना चाहती है। अब उसी समर्थन के बूते अन्ना हजारे ने राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तन की ओर कूच कर दिया है | हम कह सकते हैं कि अन्ना और उनकी टीम ने एक जुआ खेला है लेकिन जुए के इस खेल में अन्ना हजारे और उनकी टीम के जीत की संभावनाएं ज्यादा हैं | बस अब सावधानी यह रखनी होगी कि टीम वर्तमान संसद में खुद पहुंचने की बजाय लोक संसद की मांग के साथ जनता के बीच जाए | जनता उन्हें वह सब कुछ देगी जिसकी आज वे उम्मीद भी नहीं कर सकते।



     टीम अन्ना को कभी यह दावा नही करना चाहिये कि हम एक अच्छा प्रशासन देंगे। इन्हे यह कहना चाहिये कि सरकार का समाज के सामाजिक मामलों मे जितना ही हस्तक्षेप घटेगा उतना ही प्रशासन स्वतः ठीक होता जायगा। यदि इस प्रकार थोडी सी सतर्कता रखी गई तो टीम अन्ना इस पूरी लडाई को व्यवस्था परिवर्तन की दिशा देने मे सफल हो जायगी। आज की स्थिति मे सभी राजनैतिक दल अपना विश्वास खो चुके हैं। ये दल कभी एक हो नही सकतें। कम से कम दो ग्रुप तो रहेंगे ही। जनता का धैर्य टूटा हुआ है। अन्ना जी की छवि सभी राजनैतिक दलो के अच्छे से अच्छें लोगो से भी अच्छी है, कमजोर नहीं । व्यवस्था परिवर्तन शब्द और उसके पीछे छिपा हुआ भाव अन्य सबकी अपेक्षा ज्यादा पवित्र है।



     ऐसा कोई संदेह का आधार नही कि टीम अन्ना का नया प्रशासन पिछले किसी भी प्रशासन की अपेक्षा ज्यादा खराब ही होगा। ऐसे हालत में लगता है कि भारत की जनता व्यवस्था परिवर्तन के इस राजनैतिक विकल्प के प्रयत्न को उतना अधिक समर्थन दे सकती है जितने की कल्पना टीम अन्ना ने भी नहीं की है। भारत की जनता जब ताकत देती है तो छप्पर फाड कर देती है। यदि विश्वासघात करेंगे तो जनता लेते समय भी कंजूसी नही करती। मुझे तो स्पष्ट दिख रहा है कि भारत के वर्तमान राजनैतिक दलों ने भारतीय जनमानस के समक्ष राजनीति का जो नंगा नाच किया है उसे वापस करने में जनता कोई कंजूसी नही करेगी। इंदिरा जी के पतन और उत्थान का इतिहास गवाह है।



     हमें पंद्रह वर्ष पूर्व से प्रतीक्षा थी कि अब जनता को चाहिये कि वह सामाजिक आपातकाल घोषित करके सारी राजनैतिक शक्ति अल्पकाल के लिये अपने पास समेट ले। जनता पंद्रह वर्ष से आपातकाल तो मान रही है किन्तु समेटने का विकल्प नही मिल रहा था। अब अन्ना जी ने वह कमी पूरी कर दी है। जल्दी ही राजनैतिक दलों को आटे दाल का भाव पता चल जायगा। मै तो उस दिन की प्रतीक्षा मे हूँ जब मुझे यह सुनने को मिलेगा कि अगले चुनाव परिणाम मे भारत के सभी राजनैतिक दल पूरी तरह निपट गये है।

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