मुम्बई बम विस्फोट की सीख
- माया मिली न राम
एक बार फिर आतंकवाद ने मुम्बई को लपेट लिया | 13 जुलाई की तिकड़ी विस्फोटों ने फिर से साबित कर दिया कि भारत आतंकवादियों के लिए साफ्ट टार्गेट है | हमले के तुरंत बाद राजनेताओं के बयान भविष्य के लिए स्पष्ट संकेत हैं | केन्द्रीय गृहमंत्री ने माना कि हमलों की कोई खुफिया पूर्वसूचना नहीं थी | कांग्रेस के युवराज महासचिव ने कहा कि हर हमले से जनता को बचाना सरकार के हाथ की बात नहीं है | गुजरात के मुख्यमंत्री, भाजपा के करिश्माई नेता ने तो यहाँ तक कह दिया कि यह भविष्य के बड़े हमलों का रिहर्सल मात्र है | निरीह जनता बेचारी पीड़ा से कराह रही है और राज्यसत्ता ने उन्हें रामभरोसे छोड़ दिया है |
सवाल है कि जब देश के दोनों बड़े राजनैतिक दल जनता को आश्वस्त करने की बजाय अपने प्रारब्ध पर छोड़ रहे हैं, तो शासन व्यवस्था की आवश्यकता ही क्या है ? एक तरफ तो शासन यह कहे कि गिनती भर आतंवादियों को नियंत्रित करना उसके बस का नहीं, अगले ही पल वही शासन 120 करोड़ जनता में सिगरेट, हेलमेट, बालविवाह, दहेज़, बारबाला आदि विषयों को नियंत्रित करने का ठेका जबरन अपने ऊपर लेने के लिए अगर जमीन-आसमान एक करता है तो उसकी नीयत पर शक न किया जाय तो क्या किया जाय | चोरी, डकैती, अपहरण, लूट, ह्त्या, आतंकवाद, भ्रष्टाचार आदि असली समस्याएं जिस व्यवस्था से नहीं संभलती वह सामाजिक सुधार में इतनी तत्परता क्यों दिखाती है |
सर्वमान्य सिद्धांत है हर कोई अपनी-अपनी क्षमता को प्राथमिकताओं के आधार पर ही नियोजित करता है | प्रश्न है कि भारत की जनता की प्राथमिकता क्या ? सुरक्षा या समाज सुधार ? सामाजिक न्याय हमारा अभीष्ट तो है, पर सुरक्षा की कीमत पर नहीं | क्योंकि अगर बांस ही न रहे तो बाँसुरी कहाँ बजेगी |
सन 2001 में अमरीका पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ | आश्चर्य है वह दोबारा दोहराया नहीं जा सका | उलटे शासन ने उस हमले के सूत्रधार को ही बिल में घुसकर साफ़ भी कर दिया | क्या अंतर है भारत और अमरीका में | अमरीका ने 9/11 के बाद यह नीतिगत निर्णय ले लिया कि वह अपनी पूरी क्षमता पहले अपने नागरिकों की सुरक्षा पर लगाएगा, उसके बाद अगर क्षमता बचे तो वह समाज सुधार में | इसका प्रमाण है कि इन दस वर्षों के अंतराल में दो-दो अमरीकी राष्ट्रपतियों की प्रिय स्वास्थ सुधार योजना को भी वहां की सदनों ने निरस्त कर दिया |
भारत में इसके ठीक उल्टा हो रहा है | एक तरफ तो शासन ने आतंवाद निरोधी धारा टाडा को निरस्त कर दिया, भ्रष्टाचार पर सशक्त लोकपाल विधेयक लाने में आना-कानी कर रही है | दूसरी तरफ समाज सुधार के नाम पर नरेगा, खाद्य आपूर्ती बिल, सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पर रोक जैसे विधेयक लाने में तत्परता दिखाती है | इन्हें कौन समझाए कि मुर्गी को कैसे हलाल किया जाय इससे मुर्गी को कोई अंतर नहीं पड़ता | जनता जीवित रहेगी तब खाना सिगरेट आदि प्रश्न उठेंगे, मृत या शीघ्र ही मरने वालों के लिए ये किस काम के |
समय आ गया है कि भारत की राज्य भी अपनी सीमित क्षमता केवल जनता को सुरक्षा एवं न्याय प्रदान करने में लगाए | समाज सुधार जैसी कृत्रिम मृगमरीचिका अगर अब लम्बे समय तक जनता को दिखाने का प्रयास जारी रहा तो अववस्था भी बढ़ेगी और सुरक्षा-ख़तरा भी | माया या राम में से शासन हम जनता को क्या दिलाएगा यह स्पष्ट करे |
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मुमुक्षा = Power Decentralization G uardians O f D ecentralization's E ndless Z eal आदि शंकराचार्य ने हर चैतन्य के 5 चरित्र बताए 1. सत् = न मरने की इच्छा 2. चित् = नया ज्ञान हासिल की इच्छा 3. आनंद = सुख की इच्छा 4. मुमुक्षा = स्वतंत्र होने की इच्छा 5. ऐषणा = दूसरे पर प्र भाव डालने की इच्छा पहला सत् या जीवन -लंबे समय तक सभी मनुष्यों को प्राप्त नहीं था क्योंकि समाज में मत्स्य न्याय के चलते ताकतवर कमजोरों को मार देते थे, जैसे राक्षस या हिटलर मारते थे । समय के साथ आज अपवादों को छोड दें तो औसत मानवता को सत् मिल गया है, जीवन जीने का हक़ मिल गया है। दूसरा चित् या ज्ञान भी लंबे समय तक लोगों को उपलब्ध नहीं था, समाज में कुछ ही लोग गुरु होते थे, बाकी सब जानकारी हेतु गुरु पर निर्भर। पहले 15 वीं सदी में प्रिंटिंग प्रेस के चलते और आज सूचना क्रांति के बाद ज्ञान सर्वसुलभ हो गया है, हर किसी के फोन में दुनिया भर का ज्ञान मौजूद है। तीसरा, आनंद के लिए भौतिक वस्तुओं की, धन की जरूरत होती थी, पर दास प्रथा आदि के चलते बडी आबादी दरिद्र होती थी। 21वीं सदी आते आते...
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