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Lokpal v/s Jokepal




-------------लोकपाल का इंद्रजाल 


संसद के इस वर्षाकालीन  सत्र में सरकार लोकपाल विधेयक  पेश करनेवाली है | दो प्रारूप सामने आ रहे हैं | एक सरकारी लोकपाल  तथा एक जनलोकपाल | जनलोकपाल मसौदा देशभर में चर्चा का विषय बन गया है | पैंतीस वर्ष पूर्व के सम्पूर्ण क्रान्ति की लहर के बाद एक बार फिर जनता अपनी आवाज बुलंद करती दीख रही है | दूसरी तरफ सरकार गोवर्धन पर्वत उठाए गोकुलवासियों की धृषटता  पर क्रोधित इन्द्रदेव के समान दीख रही है | क्योंकि लोकपाल जनता के आपसी भ्रष्टाचार में नहीं पडेगा | लोकपाल केवल लोक की शिकायत पर तंत्र के भ्रष्टाचार की जांच करेगा | इसके पीछे कारण यह है कि भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ  के भ्रष्टाचार निरोधी चार्टर पर हस्ताक्षर कर दिया है | इस चार्टर के तहत हर देश को अपने सभी सार्वजनिक सेवकों की भ्रष्टाचार की जांच करनेवाली एक स्वतन्त्र एजेंसी स्थापित करना अनिवार्य है | भारत में वर्तमान में केवल केन्द्रीय सरकार में चालीस लाख सार्वजनिक सेवक हैं | राज्य सरकारों की तो बात ही अलग है |
  • सरकारी लोकपाल विधेयक के प्रावधानों के अनुसार लोकपाल की  नियुक्ति नौ सदस्यीय चयन समिति करेगी जिसमें पांच सदस्य सरकारी होंगे | जनलोकपाल के अनुसार केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त थामस प्रकरण की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सम्पूर्ण चयन समिति गैर सरकारी होगी |
  • सरकारी लोकपाल को केवल जांच के अधिकार प्राप्त होंगे, दंड देने के नहीं | जनलोकपाल को जांच एवं दंड दोनों के अधिकार  होंगे | क्योंकि दंडशक्ति के बिना लोकपाल दंतहीन सर्प भर बनकर रह जाएगा | साथ ही सरकारी प्रारूप संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के भी विरुद्ध होगा |
  • सरकारी लोकपाल के अंतर्गत प्रधानमन्त्री, न्यायाधीश, संसद में सांसदों का आचरण तथा वर्ग 'अ' से नीचे के अधिकारी नहीं आते | इसका सीधा अर्थ यह कि राष्ट्रमंडल खेल, बल्लारी  खान, आदर्श, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, नरेगा आदि घोटाले प्रस्तुत सरकारी लोकपालके दायरे से बाहर रहेंगे | साथ ही वर्ग 'अ' से नीचे के अधिकारियों को बाहर रखने से  से दफ्तर के बाबू, चपरासी आदि भी नहीं आते | अर्थात, सामान्य जनता को सीधे प्रभावित करनेवाला भ्रष्टाचार सरकारी लोकपाल जांच नहीं पाएगा | 
  • इसी तरह प्रधानमंत्री, सांसदों, न्यायाधीशों  को बाहर रखने के चलते टूजी घोटाला हो या संसद नोट काण्ड या न्यायमूर्ति दिनकरन मामला, ये भी सरकारी लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे | संक्षेप में कहें तो सरकारी लोकपाल बमुश्किल एक प्रतिशत सरकारी पदों की ही जांच कर सकेगा | दूसरी तरफ जनलोकपाल समस्त सार्वजनिक सेवकों को जांचने का अधिकारी होगा | साथ ही, प्रांतीय लोकायुक्त राज्य के सभी सेवकों को भी अपने दायरे में समेटेगा |
  • प्रधानमंत्री और न्यायाधीशों को लोकपाल से बाहर रखना असंवैधानिक  भी होगा क्योंकि  संविधान नागरिकों कि सुरक्षा का दस्तावेज होता है न कि तंत्र की सुरक्षा का | वीरासामी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद द्वारा उनचालीसवां संशोधन रद्द करके यह स्थापित कर दिया है | 
  • वर्तमान में किसी भी न्यायाधीश के विरुद्ध प्रक्रिया चलाने के लिए मात्र एक व्यक्ति (मुख्य न्यायाधीश) की अनुशंसा लेनी है | दूसरी ओर जनलोकपाल के अंतर्गत प्रधानमंत्री एवं न्यायाधीश दोनों शामिल हैं | भ्रष्टाचार आरोप प्रक्रिया प्रारम्भ करने के लिए किसी एक व्यक्ति की नहीं, अपितु सात सदस्यीय लोकपाल खंडपीठ की अनुशंसा लेना आवश्यक होगा |
  • सरकार का कहना है कि एकमात्र लोकपाल पर इतना बोझ लादना अव्यावहारिक  है | जनलोकपाल के अनुसार लोकपाल विभाग की पूरी संख्या बीस हजार कार्यकर्ताओं की होगी | तुलना के लिए अकेली मुम्बई पुलिस में पच्चीस हजार से अधिक का स्टाफ है |
  • सरकार कहती है कि लोकपाल के अंतर्गत प्रधानमंत्री को लाना आवश्यक नहीं क्योंकि वर्तमान  में सी. बी. आई प्रधानमंत्री की जांच कर सकती है | प्रश्न है कि जब सी. बी. आई स्वयं प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन है तो नौकर अपने मालिक की जांच  कैसे कर सकता है | झारखंड मुक्ति मोर्चा घोटाले में यह दोष स्पष्ट रूप से उजागर हो चुका है |

विश्वभर में एक भी ऐसा देश नहीं है जहां भ्रष्टाचार के मामले में किसी को भी संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो | आशा करना चाहिए कि भारत इस दुर्भाग्यपूर्ण पदवी पर आसीन नहीं होना चाहेगा | भारत में पिछले चौंसठ वर्षों में लोक एकतरफा कमजोर और तंत्र एकतरफा मजबूत हुआ है | जनलोकपाल आन्दोलन इस समीकरण को बदलकर " मालिक लोक का सेवक तंत्र " बनाने का प्रतीक मात्र है |


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