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ठोकतंत्र बनाम लोकतंत्र 
     लोकतंत्र दो शब्दों का जोड़ है | लोक एवं तंत्र | जब तंत्र, लोक-नियंत्रित होता है तब वह लोकतंत्र कहलाता है | पर जब तंत्र, लोक को नियंत्रित करने का षड्यंत्र रचाने लगता है तब वह ठोकतंत्र बन जाता है | क्योंकि 'लोक' को तंत्र, भय तथा  बलप्रयोग से ही काबू में रख सकता है | पहले बाबा रामदेव और अब अन्ना हजारे मामले में शासन ठोकतंत्र के रूप में उभरा है | सौभाग्य से भारत की जनता इक्कीसवीं सदी में जी रही है, सामंतवादी सदी में  नहीं | देशभर के हजारों स्थानों पर स्वयंभू विरोध प्रदर्शन इसका जीवंत उदाहरण हैं | 

     भारत के संविधान की  उद्देशिका का प्रारम्भ ही "हम भारत के लोग" से होता है | आश्चर्य है कि "हमारे" संविधान को संसद नाम की एक छोटी सी इकाई में बैठे मुट्ठी भर लोग आमूलचूल बदलते रहते हैं | कहने को तो "हम भारत के लोग" संविधान से बद्ध हैं, पर वास्तव में संसद के "हम" कैदी हैं | संसद ने निर्णय के "हमारे" सारे अधिकार "हम" से छीनकर अपने पास बंधुआ रख लिए हैं | और संसद का यह एकपक्षीय शक्तिशाली होना ही आजाद भारत के सभी समस्याओं की जड़ है |

     अन्ना  हजारे के समर्थन में खडी जनता को देखकर कोई यह गलतफहमी न पाल ले कि यह एक व्यक्ति के पक्ष में आंधी है | यह भीषण असंतोष है, संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली पर | संसद भी इसे समझ चुकी है | इसीलिए तो संसद में प्रधानमंत्री ने इसे संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करने की साजिश कहा |  अन्ना तो केवल इसके प्रतीकमात्र हैं | और भ्रष्टाचार निर्मूलन विधेयक जनलोकपाल केवल इसका प्रथम चरण है |

     दूसरे चरण में देश की जनता प्रतिनिधि वापसी (राईट टु रीकाल) की स्वाभाविक मांग करेगी | क्योंकि वर्तमान प्रणाली, वोटर रूपी शाकाहारी के सामने विभिन्न पशु-पक्षी-मत्स्य के स्वादिष्ट मांस परोसकर उनमें से एक को खाने की बाध्यता जैसा है | ऊपर से उसे वमन करने की भी मनाही जो है |

     तीसरे चरण में यह मांग ग्राम गणराज्य पर जाएगी | संविधान की धारा 243 ग्रामसभा/नगरपालिका के गठन को आवश्यक ठहराती है | पर इसी धारा के उपबंध 'क' तथा 'ब' इन संवैधानिक इकाइयों को शक्ति प्रदान या न प्रदान करने की भी छूट देता है | इसीलिए आज स्थानीय निकाय वन्ध्यापुत्र  बनकर रह गए हैं | इस विडम्बना को दूर करने के लिए लोग सातवीं अनुसूची में संघ, राज्य, समवर्ती सूची के साथ स्थानीय निकाय सूची की भी मांग करेंगे |

     चौथे और अंतिम चरण में देश संविधान की मुक्ति की मांग उठाएगा | आज संविधान, तंत्र का बंधक बनकर रह गया है | तंत्र अपने सभी गलत काम संविधान को ढाल बनाकर ही करता है | पहले संविधान को संशोधित कर उसे मन-मुताबिक़ बनाता है, फिर उसी संविधान की दुहाई देकर अनाप-शनाप क़ानून जनता पर ठोक देता है | आज विश्वभर  में शायद भारत एकमात्र राष्ट्र है, जहां का संविधान उसके नागरिकों की सहमति के बिना ही संशोधित होता हो | आश्चर्य है कि केवल सदन में उपस्थित सांसदों कि दो-तिहाई बहुमत से हमारा संविधान पल-भर में बदला जा सकता है |

     संसद से संविधान की मुक्ति होने पर ही हम "प्रतिनिधि लोकतंत्र" रूपी राक्षस से मुक्त हो, "सहभागी लोकतंत्र" रूपी रामराज्य को पाएंगे | यही भारत की वर्तमान के ठोकतंत्र से भविष्य के लोकतंत्र तक पहुँचने की नियति है | मार्ग में जनलोकपाल, राईट टु रीकाल, ग्राम-गणराज्य, संविधान की मुक्ति आदि निश्चित पड़ाव भर हैं |    

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