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Anti Corruption

------------अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार उन्मूलन

अन्ना हजारे आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध सशक्त प्रतीक के रूप में उभरे हैं | उनके जीवन संघर्ष से परिचित लोग यह जानते हैं की उनका पहला भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष 1975 में एक वन अधिकारी के विरुद्ध प्रारम्भ हुआ था जो आज 35  वर्ष बाद प्रधानमंत्री तक पहुँच गया | (लोकपाल विधेयक प्रधानमंत्री तक को भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून के अंतर्गत लाने का प्रावधान रखता है ) अन्ना हजारे अत्यंत सरल, सहज, निश्छल, एवं सादे व्यक्ति हैं | इन वर्षों में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में सिद्धि ग्राम को उन्होंने स्वावलंबी बनाकर एक आदर्श ग्राम का प्रारूप भी दिया है | उनका आन्दोलन भी ऐसा ही पाक साफ़ है | शासन के आदेशों के विरुद्ध समय-समय पर उठती उनकी आवाज के पीछे भी उनकी सामाजिक चेतना ही प्रमुख है |

शासन और अनशनकारियों के बीच सैद्धांतिक रूप से किसी बात पर मतभेद नहीं है  क्योंकि सरकार ने अगले सत्र में विधेयक लाने का संकल्प ले लिया है | टसमटस इस बात पर है की आन्दोलनकारी विधेयक  प्रारूप समिति में सिविल सोसाईटी अर्थात समाज के आधे प्रतिनिधि चाहते हैं, पर सरकार इसे मानने से इनकार कर रही है | सरकार का तर्क है की वह स्वयं जब समाज की प्रतिनिधि है तो अलग से सिविल सोसायिटी के सदस्यों का क्या काम ? सरकार का ऐसा कहना स्वाभाविक ही है | अन्ना हजारे ने साठ वर्षों के  शासन के एकाधिकार को जो चुनौती दे दी है | 

साठ वर्षों से शासन ने समाज को निगल कर स्वयं को समाज जो घोषित कर रखा है | इसका प्रमाण भारत का संविधान स्वयं है जिसके चार सौ से अधिक पृष्ठों में एक जगह भी समाज नामक शब्द नहीं है | आज अन्ना हजारे एवं हजारों लोग यह भेद जान गए हैं और शासन तथा समाज के अंतर को जानकार ही शासन में समाज की अलग से सहभागिता मांग रहे हैं | 

आज भारत का आम नागरिक यह समझ गया है की लोक और  तंत्र  के बीच एकपक्षीय रूप से तंत्र के पास शक्ति का ध्रुवीकरण होता जा रहा है और  वह अन्ना हजारे के माध्यम से तंत्र पर लोक की प्रधानता स्थापित करना चाहता है |  अतः इस बिल में समाज का प्रतिनिधित्व  ही हमारे लोकतंत्र  के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी |

भारत में  एक भ्रम घर कर गया है की भ्रष्टाचार व्यक्ति की करतूत होती है | असल में, भ्रष्टाचार व्यक्ति नहीं, व्यक्ति में शासन द्वारा निहित वैधानिक शक्ति करती है | पदहीन व्यक्ति भ्रष्टाचार कर ही नहीं सकता, परिचितों को धोखा भले दे दे | और शक्ति जब भी केन्द्रित होगी, उसके दुरूपयोग की संभावना भी उसी अनुपात में बढ़ जाती है |

केन्द्रीय सतर्कता आयोग का गठन भी भ्रष्टाचार को पनपते ही नोचने के उद्देश्य से हुआ था | इसीलिए उस इकाई के पास दंडशक्ति भी दी गई | पर आखिर हुआ क्या ? शासन ने उसका नेतृत्व ही ठकुरसुहाती करने वाले व्यक्ति के हाथ में देने की पूरी योजना बना डाली | भला हो सर्वोच्च न्यायालय का जिसने देर से ही सही, उस नियुक्ति को रद्द कर दिया | लोकपाल को भी ऎसी ही दंडशक्ति से लैस करने की हिमायत जन लोकपाल मांगनेवाला सभ्य समाज कर रहा है | भविष्य में लोकपाल का नेतृत्व भी थोमस जैसा कोई आदेशपाल नहीं करेगा इसकी  क्या गारंटी ?  तब फिर से सभ्य समाज को अपना काम धंधा छोड़कर,  या सर्वोच्च न्यायालय को न्याय देने के स्थान पर  नियुक्ति प्रक्रिया जैसे ओछे प्रशासनिक विषयों पर निर्णय देने हेतु बाध्य होना पडेगा |


शरीफ लोग शेर को शाकाहारी बनाने का प्रयास करते हैं | समझदार लोग शेर को पिंजड़े में बंद करने की योजना बनाते हैं | पहले तरीके में अपवाद स्वरूप सफलता मिलती भी है, फिर भी शेर का आदमखोर बनने का ख़तरा बना रहता है,| दूसरे तरीके में सफलता भले देर से मिले, शेर के आदमखोर बनने का ख़तरा समाप्त हो जाता है | क्योंकि बकरी यह जानती है की सौ में से निन्यानवे शेर  अगर शाकाहारी बन जाए  तो भी उसकी  जान को ख़तरा कम नहीं होता |


आज पूरे भारत में यह बात सर्वमान्य है की भारत की सभी समस्याओं की जड़ में भ्रष्टाचार है, और शक्ति का केन्द्रीकरण ही भ्रष्टाचार का उत्स है | अतः सभ्य समाज को भारत की सभी समस्याओं के शाश्वत निदान के लिए भविष्य में गांधी प्रणीत सत्ता  के अकेंद्रीकरण ( लोक स्वराज ) की दिशा में चलना ही होगा | उस स्थिति में पहुँचने से पहले वर्तमान में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी अहिंसक सात्विक आवाज की सुर में सुर मिलाना भी समझदारी ही होगी |

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