Skip to main content

Iran War : Ceasefire to Peace

 


ईरान युद्ध - सीजफायर या स्थायी शान्ति ?
                                              सिद्धार्थ शर्मा 


https://www.facebook.com/share/v/1GMzNP1jLE/

      हर व्यक्ति की एक सोच होती है और वो अपनी सोच को सही साबित करने की कवायद करता रहता है। व्यक्ति के जैसे ही समूहों की भी सोच होती है। वो अलग अलग होती है। देश काल परिस्थिति के अनुसार एक सोच धीरे धीरे किसी एक भूगोल में धीरे धीरे सभ्यता बन कर स्थापित हो जाती है। 

     मध्य पूर्व एक ऐसा स्थान है जहां दुनिया की तीन सोचें एक ही छोटी सी जगह पर मिलती है। 10 करोड फारस के लोग जो आदिवासियों की तरह प्रकृति प्रधान हैं और अपने संसाधन की रक्षा करते हैं। ये इरान है। 10 करोड रेगिस्तान की सोच जो जहां हरियाली मिले वहां जाते हैं, और सूख जाए तो तंबू उठा के नई हरियाली खोजने निकल जाते है।  खाड़ी के देश और इजराइल इस श्रेणी में आते हैं। तीसरी सोच मानती है कि तकनीक के बल पर कर लो दुनिया मुट्ठी में, चांद तारों पर भी झंडा गाड आओ। ये अमेरिकी सोच है।


     अब क्योंकि दुनिया भर की एक तिहाई ऊर्जा, चाहे मशीनों के लिए पेट्रोल हो या फसल के लिए खाद, वो इसी क्षेत्र में पाई जाती है, तो उस संसाधन को ये तीनों सभ्यताएं अपने पास रखने की कवायद कर रही है। ईरान का पलडा भारी इसीलिए है, क्योंकि दुनिया की इस एक तिहाई ऊर्जा का नल उसके प्राकृतिक किले के अंदर पडता है। होर्मुज जलडमरूमध्य।  

    तीसरी सोच की कमजोरी ये है कि सारी टेकनोलोजी जमीन पर बसे मानव पर तो कारगर होती है,  पर पानी को कब्जाने की टेक्नोलॉजी अभी तक नहीं बनी है। इसीलिए होर्मुज पर दूसरी सोच कब्जा नहीं कर पा रही है। कभी कब्जाना चाहती बलप्रयोग से है, तो कभी समझौता चाहती है।  ये द्वंद्व इसीलिए है क्योंकि ये सभ्यता व्यावहारिक है।  लाभ हानि का आकलन करके लाभदायक विकल्प चुनती है। 

     सचाई ये है की पानी पर कब्जा ज़माना कठिन है।  18 वीं सदी में बिहार के गंगा नदी के दियारा क्षेत्र में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाज़ों को स्थानीय ग्रामीण रोककर चुंगी वसूलने लगे तब तत्कालीन विश्वविजेता ब्रिटैन की संसद तक ने कंपनी को कह दिया की "बहादुर उग्र योद्धा जनजाति के स्थानीय लोगों" से जीतना नामुमकिन है, इसीलिए उनको चुंगी देकर छुटकारा पाया करो।  आज 300 साल बाद अमेरिका नाम की विश्वशक्ति भी होर्मुज के पानी में यही मजबूरी झेल रही है।  


     दूसरी सोच वाले अवसरवादी हैं। उनको बस संसाधन चाहिये, कीमत जो हो। वो जो जीतते हुए दिखेगा, रोज उस पाले में कूदते फांदते रहेंगे। जैसे कतर, ओमान, भारत, EU आदि।  युद्ध से पहले ये अमेरिका के साथ थे, होर्मूज पर इरान का कब्जा होते ही शांति के साथ हो लिए। इन सबमें एक और सोच वाले हैं, जो थोडा दूर रहकर इस लडाई में सबको एक दूसरे के साथ लडकर कमजोर होने दे रहे हैं, ताकि भविष्य में खुद ताकतवर बन जाएं। ये चीन है।  


     ये चारों सोच वाले व्यावहारिक हैं। मतलब जैसी परिस्थिति, वैसा लचीला व्यवहार। पर इसमें इजराइल अपवाद है। क्योंकि इजराइल नाम का आधुनिक देश, विचार के आधार पर बसा है। द्वितीय विश्वयुद्ध में यहूदियों पर अत्याचार के बाद यूरोप से उन्हें लाकर अरब जमीन पर बसाया गया। एक प्रॉमिस्ड लैंड के पौराणिक आधार पर। तो क्योंकि इजराइल व्यावहारिक कम और काल्पनिक सिद्दांत पर ज्यादा चलता है, इसीलिए वहां के 70 लाख और अमेरिका में रह रहे उसी सोच वाले 60 लाख लोग अपने पौराणिक सपने को पूरा करने के लिए वर्तमान के सभी समझौतों पर समय समय पर पानी फेरते रहेंगे। 

     उनका सिद्धांत जिस दिन दुनिया के लिए समस्या बनेगा, अचानक पूरी दुनिया उनके खिलाफ हो जाएगी। जिन 800  करोड़ लोगों को 40  दिन से युद्ध के चलते दिक्कत थी, उनको जैसे ही कल शान्ति की आस जगी, अगर उसे 80  लाख इस्राएली खराब करेंगे, तो मानवता को बुरा लगना स्वाभाविक ही है। इसीलिए आज चीन, रूस, यूरोपियन युनियन आदि सारे देश इजराइल की आलोचना कर रहे हैं जब उसने शान्ति भंग करने की कोशिश की।


     भारत इन चारों से अलग पांचवी सोच वाली सभ्यता है।  भारत को वेदों से लेकर गुरुदेव टैगोर तक ने आरण्यक सभ्यता माना।  अरण्य में जिओ और जीने दो का दर्शन होता है।  वहां प्रकृति के सामने मानव नतमस्तक रहता है। इसीलिए वेदों के ऋषि हों, राम हों, पांडव हो, या बुद्ध-महावीर -सब जंगलों में रहे।  जंगल हमके सहअस्तित्व सिखाता है, सर्वोदय सिखाता है। इसीलिए वर्तमान भारत के संविधान तक में आदिवासी क्षेत्रों की लिए अलग से पेसा कानून हैं। 

     पर युद्धकाल नहीं बुद्धकाल जैसे शान्ति का प्रवचन देनेवाली भारत सरकार लेबनान में युद्ध विराम घोषित होने के बाद निहत्थे नागरिकों पर बमबारी करनेवाले इजराइल को क्यों नहीं शांत रहने के लिए कह रही है ? 

     क्योंकि वर्तमान भारत सरकार -भारत के लोगों की सरकार कम है, और भाजपा की सरकार ज्यादा है।  भारत के 140 करोड़ में से 115 करोड़ लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया है।  भारत के लोग महाभारत के पांडव और मुंशी प्रेमचंद के पंच परमेश्वर को माननेवाले हैं -की संख्या भले कम हो, पर बिगाड़ के डर से ईमान को नहीं छोड़ सकते।  दूसरी तरफ भाजपा को सत्ता सुख के लिए एप्सटीन की हवेली पर जाने में भी कोई गुरेज नहीं है।  


     इसीलिए एप्सटीन फाइल में जिन जिन बड़े बड़ों का नाम है, चाहे वो इस्राएली हों, हिन्दू हो, अमेरिकी हो, संयुक्त अरब अमीरात के शेख हो, सऊदी के सलमान हो -ये जय इजराइल करते पाए जा रहे हैं।  जिन जिन देशों का नाम एप्सटीन फाइल्स में नहीं है, चाहे वो ईरान हो, चीन हो, रूस हो, ओमान हो, यूरोपियन यूनियन हो, पकिस्तान हो -ये सारे लोग शान्ति के पक्ष में खड़े दिख रहे हैं।


     अब इस युद्ध में असली शान्ति तभी हो पाएगी जब चारों सोच वाले खाड़ी में युद्ध से प्रभावित सारे देशों के लिए एक विन-विन सिचुएशन पैदा कर सकें।  एक ऐसा फॉर्मूला जिसे अमेरिका-इजराइल-ईरान-चीन-रूस-खाड़ी के सारे देश मंजूर करें।  

     जब तक ऐसा समग्र फॉर्मूला नहीं बनेगा, खाड़ी के युद्ध की धधक गाहे-बगाहे, समय-समय पर, गरम-ठंडा, ज्यादा-कम होते ही रहेगी।  


Comments

Popular posts from this blog

ELEGY Sepulchral

मुमुक्षा = Power Decentralization G uardians O f D ecentralization's   E ndless Z eal आदि शंकराचार्य ने हर चैतन्य के 5 चरित्र बताए 1. सत् = न मरने की इच्छा 2. चित् = नया ज्ञान हासिल की इच्छा 3. आनंद = सुख की इच्छा 4. मुमुक्षा = स्वतंत्र होने की इच्छा 5. ऐषणा = दूसरे पर प्र ​ भाव डालने की इच्छा     पहला सत् या जीवन -लंबे समय तक सभी मनुष्यों को प्राप्त नहीं था क्योंकि समाज में मत्स्य न्याय के चलते ताकतवर कमजोरों को मार देते थे, जैसे राक्षस या हिटलर मारते थे । समय के साथ आज अपवादों को छोड दें तो औसत मानवता को सत् मिल गया है, जीवन जीने का हक़ मिल गया है।     दूसरा चित् या ज्ञान भी लंबे समय तक लोगों को उपलब्ध नहीं था, समाज में कुछ ही लोग गुरु होते थे, बाकी सब जानकारी हेतु गुरु पर निर्भर। पहले 15 वीं सदी में प्रिंटिंग प्रेस के चलते और आज सूचना क्रांति के बाद ज्ञान सर्वसुलभ हो गया है, हर किसी के फोन में दुनिया भर का ज्ञान मौजूद है।     तीसरा, आनंद के लिए भौतिक वस्तुओं की, धन की जरूरत होती थी, पर दास प्रथा आदि के चलते बडी आबादी दरिद्र होती थी। 21वीं सदी आते आते...

Cockroach Playbook: Anticipatory Guidance

  Cockroach & Crossbar Task There was intense structural cognitive dissonance captured today in the Cockroach protest. The collective psyche of youth Cockroaches, labeled as a mere parasite, embraces the mascot of absolute survival to resolve  friction. This is not mere political unrest; it is a manifestation of raw psychological resilience of students managing systemic trauma through creative externalization First Principles of Systemic Deceleration & Psychology of Flight      Every systemic crisis leaves a hidden trail of kinetic momentum. When the world stops suddenly, we do not all land in the same place. In fact, some of us are left traveling in mid-air.      A competent driver navigating a sports car down a narrow alley knows his machine can hit 100 mph. He also knows the walls are tight, visibility is low, and stopping safely requires latitude. Therefore, he restrains the engine, moving at a cautious 20 mph. He understands that powe...

The Age of the Mental Human

People who never met  impacting the 🌍 "Watch 2 minute TV interview snippet above, or read the full core thesis below." Iran’s recent conflict was the first truly impersonal war humanity has ever witnessed. Fifteen countries were involved. More than 100 days of death and destruction passed. Even kids killed. Grief -sadly yes, closure -regrettably no, justice -gone for a toss.  Why ? Because, not a single human soldier set foot on enemy territory. No land was seized. No physical resources were captured. The war did not take place on land, on water, or in the air. Iran sustained itself through missiles. This was a war waged in space and silicon. Destruction at a Distance Without ever meeting physically, humans can now destroy one another.  Strangely, when peace arrives, physical interaction is equally absent. The Presidents of the United States and Iran signed a peace MoU online. Two digital signatures. Destruction and construction no longer require physical proximity. I...